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जैन धर्म के पाँच मूलभूत सिद्धांत

धर्म शब्द का अंग्रेजी पर्याय है रिलिजन जो बनता है ‘रि’ और ‘ लिगेयर ‘ से अर्थात् ‘पुनः’ एवं ‘संबंध बनाना’ इस प्रकार रिलिजन अर्थात धर्म का अर्थ है ‘पुनः संबंध स्थापित करना’।

इस जगत का प्रत्येक जीव अपने मूल स्रोत — अपने शाश्वत चैतन्य स्वरुप से अलग वियोजित हो गया है परन्तु केवल मानव जीवन में यह संभावना है कि इस स्रोत को पहचान कर हम अपने चैतन्य स्वरुप कीओर लौटकर उससे एकीकार हो सकें।

अतः धर्म का अर्थ है अपने पृथक हो गए शाश्वत स्वरुप से पुनः संबंध स्थापित करना। और इसी पुनर्स्थापना में धार्मिक संप्रदाय इस नश्वर जगत के मोह से छूटकर अनंत आनन्दमय शाश्वत जगत के साथ संबंध जोड़ने की कला हमें सिखाते हैं।

धार्मिक संप्रदायों की भूमिका

आज समाज में अनेक धार्मिक संप्रदाय प्रचलित हैं- जैसे हिन्दू, जैन, सिक्ख, बौद्ध इत्यादि। जब हम जैन धर्म की बात करते हैं तो इसका मतलब है जीवन जीने की, शाश्वत से संबंध स्थापित करने की जैन पद्यति। इसी प्रकार हिन्दू धर्म भी जीवन जीने और शाश्वत व अनंत आनंद स्वरुप में खोने की एक अलग प्रक्रिया व प्रणाली है। स्वभावतः मनुष्य सदैव अनंत व शाश्वत सुख की खोज में रहा है, अतः वह किसी न किसी धर्म का अनुकरण करता रहा है।

हम यहाँ जैन धर्म के ५ मूलभूत सिद्धांतों का विश्लेषण कर रहे हैं। यह ५ सिद्धांत क्रमबद्ध रूप से हमें इस प्रकार जीवन जीना सिखाते हैं जिससे हम अपने भीतर रही अनंत शांति एवं आनंद की अनुभूति कर सकें।

१. अहिंसा :

जीवन का पहला मूलभूत सिद्धांत देते हुए भगवान महावीर ने कहा है ‘अहिंसा परमो धर्म’। इस अहिंसा में समस्त जीवन का सार समाया है ; इसे हम अपनी सामान्य दिनचर्या में ३ आवश्यक नीतियों का पालन कर समन्वित कर सकते हैं।

क ] कायिक अहिंसा (कष्ट न देना): यह अहिंसा का सबसे स्थूल रूप है जिसमें हम किसी भी प्राणी को जानते — अनजाने अपनी काया द्वारा हानि नहीं पहुंचाते। मानव जीवन की अमूल्यता इसी तथ्य में निहित है कि उसके पास दूसरों को कष्ट से बचाने की अद्भुत शक्ति है। अतः स्थूल रूप से अहिंसा को मानने वाले किसी को भी पीड़ा, चोट, घाव आदि नहीं पहुँचाते।

ख ] मानसिक अहिंसा (अनिष्ट नहीं सोचना): अहिंसा का सूक्ष्म स्तर है किसी भी प्राणी के लिए अनिष्ट, बुरा, हानिकारक नहीं सोचना। हिंसा से पूरित मनुष्य सामान्य रूप से दूसरों को क्षति पहुँचाने के वृत्ति से भरा होता है लेकिन अहिंसा के सूक्ष्म स्तर पर किसी की भी भावनाओं को जाने-अनजाने ठेस पहुँचाने का निषेध है।

ग ] बोद्धिक अहिंसा (घृणा न करना): अहिंसा के सूक्ष्तम स्तर पर ऐसा बोद्धिक विकास होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति घृणा के भाव का त्याग हो जाता है। हम निरंतर अपने आस-पास रही उन वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियों के प्रति घृणाभाव से भरे रहते हैं जो हमारे प्रतिकूल हों अथवा जिन्हें हम अपने अनुकूल न बना पा रहें हों। यह घृणा की भावना हमारे भीतर अशांति, असंतुलन व असामंजस्य उत्पन करती है। अतः अहिंसा का सूक्ष्मतर स्तर पर प्रयोग करने के लिए हमें किसी भी प्राणी से घृणा न करते हुए जीवन की हर परिस्थिति को सहर्ष स्वीकार करने की कला सीखनी होगी। हमें जीवन में रही वस्तु-व्यक्ति-परिस्थिति को हटाने का प्रयत्न नहीं करना अपितु उनके प्रति रहा अपना घृणा भाव हटाना है।

२. सत्य

धर्म जगत में सत्य के सिद्धांत की व्याख्या सबसे अधिक भ्रांतिपूर्ण प्रकार से की जाती है। हम अपने बच्चों व युवा पीढ़ी को जैन सिद्धांत समझाते हुए हमेशा सत्य बोलने की प्रेरणा देते हैं परन्तु क्या दूसरी व तीसरी कक्षा में पढ़ाया जाने वाला नीति का यह सूत्र भगवान महावीर द्वारा दिया गया महाव्रत हो सकता है ? अवश्य ही भगवान के सत्य महाव्रत के भीतर गहरा आध्यात्मिक आशय समाहित है। इसलिए ‘श्रीमद राजचंद्र मिशन’ में हम इस सिद्धांत का अभिप्राय मानते है ‘सही चुनाव करना’। हमें अपने मन और बुद्धि को इस प्रकार अनुशासित व संयमित करना है कि जीवन की प्रत्येक परिस्तिथि में हम सही क्रिया व प्रतिक्रिया का चुनाव करें।

अतः ‘सत्य’ सिद्धांत का अर्थ है -
1 ] उचित व अनुचित में से उचित का चुनाव करना 
2 ] शाश्वत व क्षणभंगुर में से शाश्वत का चुनाव करना

जब सदगुरु द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं को हम अपने जीवन का आधार बनाते हैं तो उपरोक्त कथित सत्य का सार हमारे मन व बुद्धि को शुद्ध करते हुए, जीवन की प्रत्येक अवस्था में हमें उचित व शाश्वत का चुनाव करने की सहज प्रेरणा देता है।

३. अचौर्य

चेतना के उन्नत शिखर से दिए गए भगवान महावीर के ‘ अचौर्य महाव्रत ‘ को हम संसारी जीव अपनी सामान्य बुद्धि द्वारा पूर्णतया समझ नहीं पाते। दूसरों की वस्तुएँ न चुराना ही इसका अभिप्राय मानते रहे हैं परन्तु भगवान अपनी पूर्ण जागृत केवलज्ञानमय अवस्था से इतना उथला संदेश नहीं दे सकते। इस महाव्रत का एक दूसरा ही गहरा प्रभावशाली आयाम है।

स्वरुप को प्राप्त हुए भगवान का गहन प्रतीकात्मक संदेश हम तभी समझ पाते हैं जब हम अपनी चेतना को ईश्वरीय चेतना के साथ संरेखित करते हैं। अन्यथा अपनी सामान्य बुद्धि से इन प्रभावशाली शब्दों का केवल ऊपरी अर्थ पकड़ कर पूरा जीवन भ्रम में ही व्यतीत कर देते हैं।

अतः अचौर्य सिद्धांत का अर्थ केवल दूसरों की वस्तुएँ चुराना नहीं अथवा हड़पने की सोचना नहीं, मात्र इतना नहीं अपितु इसका गहन आध्यात्मिक अर्थ है — शरीर-मन-बुद्धि को मैं नहीं मानना। मैं शुद्धचैतन्य स्वरुप हूँ तथा शरीर-मन-बुद्धि इस मानव जीवन का यापन करने हेतु मात्र साधनरुप हैं जिनके द्वारा हम अपने यथार्थ स्वरुप तक पहुँच सके। जैसे जल से भरी मटकी का कार्य केवल जल को अपने भीतर संभालना है ;मटकी जल नहीं है। प्यास जल से बुझती है, मटकी से नहीं। इसी प्रकार चेतना इस शरीर-मन-बुद्धि में व्यापक है परंतु वह ‘मैं’ अर्थात स्वरुप नहीं है। अपनी अज्ञान अवस्था से बाहर आकर जब हम अपने शुद्ध आत्मिक स्वरुप को ही ‘मैं व मेरा’ मानते हैं तभी भगवान द्वारा प्रदत्त अचौर्य के सिद्धांत का पालन होता है।

४. ब्रह्मचर्य

यह सिद्धांत उपरोक्त ३ सिद्धांतों — अहिंसा, सत्य, अचौर्य के परिणामस्वरूप फलीभूत होता है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘ ब्रह्म + चर्य ‘ अर्थात ब्रह्म [ चेतना ] में स्थिर रहना।

जब मनुष्य उचित — अनुचित में से उचित का चुनाव करता है एवं अनित्य शरीर-मन-बुद्धि से ऊपर उठकर शाश्वत स्वरुप में स्थित होता है तो परिणामतः वह अपनी आनंद रुपी स्व सत्ता के केंद्र बिंदु पर लौटता है जिसे ‘ ब्रह्मचर्य ‘ कहा जाता है। शरीर-मन-बुद्धि को ‘मैं’ मानने की धारणा से बाहर निकलने के परिणामरूप शारीरिक साहचर्य व संभोग की चाहतें गिरती हैं- इस अवस्था को हम ब्रह्मचर्य मान सकते हैं क्योंकि जब अपने ही शरीर से मोह (मेरापना) नहीं रहता है तब किसी शरीर से भोग की तृष्णा को छोड़ पाना अत्यंत सरल हो जाता है।

५. अपरिग्रह

जो स्व स्वरुप के प्रति जागृत हो जाता है और शरीर-मन-बुद्धि को अपना न मानते हुए जीवन व्यतीत करता है उसकी बाह्य दिनचर्या संयमित दिखती है, जीवन की हर अवस्था में अपरिग्रह का भाव दृष्टिगोचर होता है तथा भगवान महावीर के पथ पर उस भव्यात्मा का अनुगमन होता है।

अपरिग्रह के निम्नलिखित तीन आयाम हैं -
१ ] वस्तुओं का अपरिग्रह: जैसे-जैसे हम शाश्वत चैतन्य सत्ता की निकटता में आते हैं , वैसे-वैसे क्षणिक सांसारिक वस्तुओं का मोह छूटता है। अतः वस्तुओं की उपलब्धता अथवा गैर उपलब्धता दोनों ही स्थितियों में समान भाव रहता है तथा मानसिक व शारीरिक व्याकुलता नहीं होती।
२ ] व्यक्तिओं का अपरिग्रह: संसार की लीला में व्यक्ति आते हैं; अपनी भूमिका निभाते हैं व चले जाते हैं। जिसे इस स्वांग की वास्तविकता का बोध हो जाता है वह इस अभिनय के पार जाकर अपने निज स्वरूप को पहचान लेता है। जैन के रूप में जीवन व्यतीत करता हुआ मनुष्य व्यक्तिओं रूपी परिग्रह में मूर्छित नहीं रहता। वह चाहे जहाँ भी रहे — जनसमूह में अथवा एकांत में , हमेशा प्रसन्नचित रहता है क्योंकि उसकी शांति व आनंद बाह्य जगत से नहीं अपितु भीतर स्वात्म के अनंत स्रोत से उत्पन्न होती है।
३ ] विचारों का अपरिग्रह: जागृत अवस्था को प्राप्त हुए मनुष्य सर्व समावेशी मानसिकता धारण करते हुए विचारों के आग्रह का त्याग करते हैं। वे भगवान महावीर द्वारा प्रणीत अनेकांतवाद व स्याद्वाद के सिद्धांत को हृदयगत करते हुए सभी के विचारों का सम्मान करते हैं। वे मानते हैं कि कोई भी विचार परम या संपूर्ण नहीं हो सकता क्योंकि केवल शुद्ध चैतन्य स्वरुप ही परम व संपूर्ण है जिसे विचारों के पार जाकर ही अनुभव किया जा सकता है।

इस प्रकार जैन धर्म के यह ५ सिद्धांत जीवन व्यापन की ऐसी शैली प्रदान करते हैं जिससे हम इस मानवीय शरीर से मुक्ति मार्ग की ओर अग्रसर हो सकें, आत्म-निरीक्षण करते हुए अपने शुद्ध चैतन्य आत्म-अनुभव तक पहुँच सकें।

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Article By:
Himanshu dhiman